Saturday, June 22, 2013

Aligarh visit

पिछले दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गया था। वैसे तो मैं कई बार अलीगढ़ गया हूं लोकिन रात में कभी नहीं रुक पाया। सुबह कार से गया और शाम को वापस। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मित्रों ने कई बार आग्रह किया कि कम से कम एक दो दिन रुककर वहां की विश्वविद्यालयी ज़िंदगी को नजदीक से देखा जाय पर कभी संभव नहीं हो पाया। इस बार भी लौटने की जल्दी थी अत: मित्र अजय बिसारिया विश्वविद्यालय के ही समीप के एक ऐसे ढाबे पर ले गए जो शाकाहारी भोजन के लिए प्रसिद्ध है। अजय ने बताया कि इस ढाबे का बैंगन का भर्ता सर्वादिक प्रसिद्ध है। ढाबे पर पहुंचने पर उसकी हालत देखकर किंचित निराशा हुई। भयंकर गर्मी, तंदूर का धुआं और उस पर भी प्रतीक्षा करती भारी भीड़। मन वापस लौटने को हुआ कि भोजन के लिए शरीर को इतना कष्ट देना क्या उचित है? उस ढाबे पर इतनी भीड़ थी कि अपनी बारी आने के लिए थोडा इंतजार करना पड़ा. देखने में ढाबा बहुत विशेष नहीं लगा. सड़क के किनारे बने अनेक सैकड़ों ढाबों जैसा ही. ढाबा अलीगढ से अनूपशहर जाने वाली सड़क पर बाएं ओर है. एक बड़ा सा कमरा, उसके आगे टीन का एक शेड. शेड के बीचोंबीच रखी मेज और उसके पीछे रखी कुर्सी पर बैठा या फिर मोटापे के कारण अधलेटा सा, खाने के पैसे लेने वाला ढाबे का मालिक या संभव है कोई उसका प्रतिनिधि या फिर कर्मचारी. अन्य ढाबों की तरह यहाँ भी दूसरे कर्मचारियों के साथ साथ कम से कम चार ‘छोटू’ रहे होंगे जिनमें से एक मेजें साफ़ करने में लगा था, एक मेजों पर स्टील के गिलास रखकर उनमें पानी भर रहा था, एक झूठे बर्तन साफ कर रहा था और चौथा सामने के नल से पानी भरकर ला रहा था. यानी सभी छोटू अपने अपने कार्यों में मुस्तैदी से लगे थे. मुझे क्योंकि जल्दी दिल्ली लौटना था सो बैचेन होकर ये सोच रहा था कि हममें से कोई तो ऐसा निकलेगा जो प्रतीक्षा से परेशान होकर या तो खाना खाने के लिए मना कर देगा या फिर किसी और बेहतर जगह जाने का प्रस्ताव रख देगा. लेकिन किसी के चेहरे पर भी जल्दबाजी या बैचैनी का कोई लक्षण नहीं था. मैं तो कुछ कह ही नहीं सकता था क्योंकि मेरा ही आतिथ्य सत्कार करने के लिए तो ये साथी दोस्त गर्मी की मार झेल रहे थे, वरना अपने अपने  घर जाकर आराम से खाना खाते. अतः मैंने अपनी बैचेनी को छुपा लिया और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा. जल्द ही एक पूरी और एक आधी मेज खाली हो गयीं. एक आधी इसलिए कि चार में से दो ग्राहक उठ चुके थे और दो अपना खाना लगभग समाप्त करने वाले थे. हम कुल छ लोग थे. अलीगढ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज़ुबेरी, प्रो. आशिक अली, डा. विश्व नाथ शुक्ला, डा. शम्भूनाथ तिवारी, अजय बिसारिया और मैं. अन्दर ढाबे में जाकर गर्मी और भी अधिक थी. हम लोग बैठे और अजय ने खाने का आर्डर कर दिया जिसमें बैंगन के भरते के अलावा दाल फ्राई भी थी. तंदूरी रोटी का शौक मुझे हमेशा रहा है. जब भी कार से जाते हुए रास्ते में कोई ठीक ठाक सा ढाबा दिखाई देता है तो मैं दाल फ्राई के साथ तंदूर की गर्म गर्म रोटियां अवश्य खाना पसंद करता हूँ. खैर जब खाना मेज पर सामने आया तो उसकी खुशबू से भूख और बढ़ गयी. पंखे की हवा के बावजूद गर्मी लगभग असह्य हो रही थी लेकिन खाने में तल्लीन हो जाने के कारण उसका अहसास अधिक न हुआ. मैंने प्रो. ज़ुबेरी और अजय बिसारिया को धन्यवाद दिया बैंगन के भरते के लिए प्रसिद्ध इस ढाबे के खाने का स्वाद चखाने के लिए. तभी अजय का एक और प्रस्ताव आया अलीगढ में हाथरस की प्रसिद्ध लस्सी पिलाने ले जाने का. वह भी लाज़वाब. इस आतिथ्य के लिए अपने इन मित्रों की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही होगी. शेष फिर ..