मेरे दादाजी के पांच बेटे और एक बेटी हुई. बेटी सबसे छोटी थी अतः मेरे
दादा और दादी उनको बहुत प्यार करते थे. दादा-दादी ही नहीं बल्कि पांचों भाई उन्हें
बहुत प्यार करते थे. बड़े दादा जी यानी मेरे दादाजी के बड़े भाई को पांच संतानें
हुईं. तीन भाई और दो बहनें. संयुक्त परिवार था. ज़मीन बहुत थी, संपन्न
परिवार था और बड़ा काश्तकार होने के कारण गाँव में सम्मान भी था. अतः दादाजी बड़ी
ठसक के साथ रहते थे. उनको विभिन्न स्थानों पर घूमने का बड़ा शौक था. यही वजह थी कि दादाजी
खेती के काम की देखभाल प्रायः अपने बड़े भाई और कामगारों के हवाले सौंपकर स्वयं
कहीं न कहीं यात्रा पर निकल जाते. उन दिनों आज की तरह आने-जाने के साधन तो थे
नहीं. अतः साधन संपन्न घरों में लोगों के पास अपने स्वयं के साधन होते थे. आने-जाने
के लिए मेरे घर पर एक रथ था, एक रब्बा था और एक बाईस्कल थी. मेरे दादा जी के पास भी
एक बड़ी ही खूबसूरत घोड़ी थी. वे हमेशा घोड़ी पर बैठकर ही कहीं जाया करते. यहाँ तक कि
खेतों को देखने के लिए भी अपनी उसी सवारी का उपयोग किया करते. मेरे मन में आज भी
घोड़ी पर बैठे हुए अपने दादा जी की वह छवि अंकित है. सफ़ेद कुर्ता-धोती और सर पर
गाँधी टोपी पहने हुए वे बहुत ही सुदर लगते थे. कद उनका बहुत लम्बा नहीं था और शरीर
भी भरा हुआ था पर उन्हें मोटा बिलकुल नहीं कहा जा सकता था. उनकी भरी-भरी मूंछें
थीं जो उनके चहरे पर बिलकुल फिट बैठतीं थीं. मेरे दादा बहुत नेकदिल इंसान थे और
सदैव दूसरों की मदद करने वाले. इसी का परिणाम है कि आज भी गाँव के आस-पास के
बुजुर्ग लोग मुझे पिताजी के नाम से नहीं बल्कि दादाजी के साथ जोड़कर पहचानते हैं. दो
भाइयों में बंटवारा हो जाने के बावजूद मेरे दादाजी के हिस्से में बहुत ज़मीन आई. वे
अकेले थे अतः सोचते थे कि उनके पांचो बेटे खेती का काम ही देखेंगे. शायद इसीलिए
उन्होंने केवल सबसे बड़े बेटे को ही स्कूल भेजा और बाकी अन्य चारों को पढने स्कूल नहीं
भेजा.
Thursday, November 13, 2014
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