Monday, September 16, 2013

Bore

जेएनयू में एक ज़माने में कुछ शब्दों का बहुत प्रचलन था. मसलन चाट, चिपकू, गोंद और फेवीकोल आदि आदि. काशीराम के ढाबे पर चाय पीने बैठे होते तो किसी प्रतिभाशाली चाट को आते देखकर जल्दी उठ जाते ये कहते हुए कि भाग लो चाट आ रहा है. कोई विद्यार्थी कुछ अटपटी बात कहता तो किसी की टिप्पणी होती कि क्या चाट जैसी बाते का रहे हैं. फलां के साथ बहुत रहते हैं आजकल क्या?? और भी कुछ इसी प्रकार की टिप्पणियां. वास्तव में जब आप किसी से बात न करना चाहें और किसी कार्य में बहुत व्यस्त हैं तो मित्र की मौजूदगी भी अप्रिय लगने लगती है. पर ये एक अलग प्रसंग हो सकता है. यहाँ बात परमानेंट चाटों के बारे में है. जेएनयू के ही एक मित्र ने उस समय हद ही कर दी जब मजाक में ही सही उसने परेशान होकर चाटों की भी सैधांतिक व्याख्या कर डाली. उसका कहना था कि चाटवाद के अनुसार चाट तीन प्रकार के होते हैं. एक ऐसे लोग जिनसे बात करके आप चट जाएँ और थोड़े समय के लिए सही काम करने के लायक न रह जाएँ. ऐसे लोगों से थोड़ी सी सावधानी बरत कर आप बच सकते हैं. ये सामान्य कोटि के चाट कहे जा सकते हैं. दूसरी श्रेणी ऐसे लोगों की बनती है जिनके बारे में आपस में बात करके आप चट जाएँ यानी कि बोर हो जाये, ऊब जाये और पूरे दिन काम न कर पायें. ऐसे चाटों से बचने के लिए अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता होती है. तीसरी श्रेणी और भी भयानक लोगों की है. इस सम्बन्ध में दर्शन शास्त्र बहुत सावधान रहने की हिदायत देता है. वास्तव में चाटों का ये ऐसा वर्ग है जिनके स्मरण मात्र से ही आप चाट जाएँ यानी कि इतने बोर हो जाएँ कि बस हो गया आपका उस दिन का काम. यानी कि इस कोटि के लोगों की याद आना ही काफी है आपकी बोरियत में वृद्धि करने के लिए. इस बात के लिए कि आप चट गए. इस सदमे से उबरने में समय लगता है.’ आजकल फेसबुक पर भी कुछ ऐसी ही सावधानी बरतने की दरकार है. नहीं तो तीसरी कोटि के महान कलाकार आपको अपना अहसास कराने में देर नहीं करेंगे.

JNU

जेएनयू में सतलज हास्टिल के सामने बने शापिंग सेंटर में पुस्तकों की एक दुकान थी, गीता बुक सेंटर। उसके मालिक एक बंगाली थे जिनको सब लोग दादा कहकर पुकारते थे। बंगाली दादा बहुत ही शानदार व्यक्ति थे। मिलनसार। अपने खरीदार की मन: स्थिति को भी वे अच्छी तरह समझते थे।। जिन छात्रों को फेलोशिप मिलती थी उन पर दादा का विशेष प्रेम होता। मैं भी उनमें से एक था। यही कारण था कि जब भी कोई नयी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित होकर आती वे उसे हम लोगों को इस प्रकार बेरुखी से दिखलाते कि हमारी जिज्ञासा उस पुस्तक में और भी अधिक बढ़ जाती। जब पुस्तक विशेष के बारे में अधिक विस्तार से पूछा जाता तो वे समझ जाते कि छात्र की रुचि बढ, रही है। आश्वस्त होने पर वे पुस्तक के बारे में बताकर कहते कि 'एक ही प्रति है दे नहीं सकता।' बहुत आग्रह करने पर दादा कहते कि 'नामवर सिंह जी के लिए लाया हूं, आपके लिए कल ला दूंगा।' फिर कहते कि 'अच्छा ये पुस्तक आप ले लीजिए, नामवर जी के लिए कल दूसरी ला दूंगा।' मनपसंद पुस्तक और वह भी नामवर जी के लिए संभाल कर रखी हुई पुस्तक खरीदकर हम प्रमुदित होकर अपने कमरे में लैटते। लेकिन हमारे जाते ही दादा रैक के पीछे रखी किताबों में से दूसरी प्रति निकाल कर दूसरी जगह रख देते।और किसी अन्य छात्र से नयी किताब की चर्चा करने में व्यस्त हो जाते। यही स्थिति कमोबेश अन्य विभागों के विद्यार्थियों की भी थी। लेकिन दादा की इस सेल्समैनशिप की धीरे-धीरे आदत सी पड़ गयी। आज पुरानी उन यादों के बारे में सोचकर बहुत अच्छा लगता है।

Nazeer

नजीर अकबराबादी ने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ में लिखा है. उन्होंने "कृष्णलीला संबंधी बहुत से पद्य खड़ी बोली हिंदी में लिखे". इन पद्यों का उल्लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' किया है. वे नजीर को एक 'मनमौजी सूफी भक्त' कहते है. आज कृष्ण-जन्माष्टमी है. कई साथियों ने नजीर अकबराबादी की कुछ नज्में उद्धृत की है. नजीर अकबराबादी की एक बेहद खूबसूरत नज़्म याद आई. मूल तो मुझे मिली नहीं, उनकी जो नज़्म शुक्ल जी ने उद्धृत की है, वह यहाँ प्रस्तुत है.
यारो सुनी य दधि के लुटैया का बालपन.
औ मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन.
मोहन स्वरुप नृत्य करैया का बालपन.
बन-बन में ग्वाल गौवें चरैया का बालपन.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन
क्या क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन.
परदे में बालपन के ये उनके मिलाप थे.
जोती सरूप कहिये जिन्हें सो वो आप थे.
- नजीर अकबराबादी

Primary Teacher

प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में जिस अध्यापक ने मुझे पहले दिन अौपचारिक रूप से पढ़ाया उनका नाम था दौलत राम। दौलतराम के नाम में ही दौलत थी वरना दौलत से दूर-दूर तक उनका कोई लेना-देना नहीं था। मेरे पिताजी प्राय: उनके घर भुट्टे और सर्दियों में गन्ने तथा गुड़ आदि भिजवाते। मेरा बाल मन सोचता कि जब हम फीस देते हैं तो पिताजी सामान क्यों भिजवाते है? बाद में मैंने जाना कि उनके पास ज़मीन नहीं थी। वे पड़ौस के ही गांव से आते थे और समय के इतने पाबंद कि मुझे तो गुस्सा तक आ जाता कि रोज क्यों आते हैं, कभी बीमार भी नहीं होते, आदि-आदि । वे पढ़ाने के मामले में बहुत सख़्त थे तथा गलतियों के लिए बहुत डांटते थे। मुझे उनसे बहुत डर लगता था। जब दूसरे बच्चों की किसी बात पर पिटाई होती तो मैं और भी डरने लगता। शायद इस डर का भी परिणाम रहा होगा कि मैंने अपने पढ़ाई के काम में कभी कोई कमी नहीं रहने दी। परिणामत: पिटाई की बात तो दूर कभी डांट भी नहीं पड़ी। यह सचमुच उसी मज़बूत फाउंडेशन का ही परिणाम है। ऐसे अपने ज्ञानदाता गुरू के प्रति नमन।

Rakhi

इस साल रक्षा-बंधन का त्यौहार सुना है रात में मनाया जा रहा है। मैंने अपने एक मित्र को फोन किया यह जानने के लिए कि आखिर इसका रहस्य क्या है? राखी भी क्या कोई रात के अंधेरे में मनाने की चीज़ है? अब तक तो दीपावली के बारे में ही सुना था। यह लगभग ग्यारह बजे के आसपास की बात है। साथी ने मेरी जिज्ञासा पर तो ध्यान नहीं दिया उल्टे चौंकते हुए बोला कि 'यह भी नही मालूम कि राखी कब है? टीवी चैनलों पर विद्वान लोग बार बार बता रहे हैं राखी के महत्व और उसे मनाए जाने की विधियों आदि के बारे में। किस दुनिया में रहते हो तुम? जामिया में पढ़ाते-पढ़ाते सभी परंपराएं और तीज-त्यौहारों का भी ध्यान नहीं रख पाते?' मैं तो चौंकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा था। सोचने लगा कि विश्वविद्यालय अथवा पढ़ाने से राखी का क्या संबंध हो सकता है? फिर खुद को आश्वस्त करते हुए सोचने लगा कि साथी की मज़ाक की आदत है? छोड़ो।
मैंने पूछा कि तुम हो कहां? वह बोला कि 'और कहां होता, ट्रैफिक में फंसा हूं, धौला कुआं के आसपास। पत्नी अपने भाई को राखी बांधने द्वारका जा रही हैं। केवल सुबह सात बजे तक का समय दिया गया है बहनों को राखी बांधने के लिए, बस।' कुछ झुंझलाहट भरी मन:स्थिति में कहने लगा कि 'मेरे तीन साले यानी मेरी पत्नी के प्यारे तीन भाई शहर के तीन कोनो में रहते हैं जैसे दिल्ली की रखवाली की जिम्मेदारी इसी परिवार के कंधों पर है। क्या करूं? सभी के यहां जाना है। लगता है रात भर घूमता ही रहूंगा।' मैंने भी एक बार तो सोचा कि क्यों न मैं भी अपने घर की राखी की कुछ जिम्मेदारी -कम से कम शाहदरा की तरफ की- अपने इस साथी को थमा दूं। पर लगा कि यह कुछ ज़्यादती ही हो जाएगी। अत: साथी का हौसला बढ़ाना ही बेहतर समझा।

Saturday, September 14, 2013

ASC 5th Refresher Course in Hindi


अकादमिक स्टाफ कालिज, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आज हिन्दी का पांचवां रिफ्रेशर कोर्स शुरू हुआ।। इस पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में दिल्ली और दिल्ली के बाहर के 52 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो.नामवर सिंह जी ने पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया। इस अवसर पर अपना व्याख्यान देते हुए उन्होंने रिफ्रेशर कोर्स को पुनश्चर्या पाठ्यक्रम की जगह पुनर्नवा पाठ्यक्रम कहे जाने पर दल दिया। निराला की एक कविता का पाठ और साथ ही उसकी व्याख्या करते हुए आचार्य प्रवर ने ज़ोर देकर कहा कि कविता का सही पाठ करना अध्यापक के लिए एक बहुत बड़ा कौशल है। अकादमिक स्टाफ कालिज के निदेशक प्रो एम मुज़्तबा खान ने स्वागत भाषण देते हुए हिन्दी के विकास पर बल दिया उसकी भूमिका की सराहना की। संयोजक प्रो महेन्द्रपाल शर्मा ने पाठ्यक्रम की थीम 'समकालीन हिन्दी साहित्य की चुनौतियां' की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो हेमलता महीश्वर ने की
— with Hemlata Mahishwar and गंगा सहाय मीणा.

Saturday, June 22, 2013

Aligarh visit

पिछले दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गया था। वैसे तो मैं कई बार अलीगढ़ गया हूं लोकिन रात में कभी नहीं रुक पाया। सुबह कार से गया और शाम को वापस। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मित्रों ने कई बार आग्रह किया कि कम से कम एक दो दिन रुककर वहां की विश्वविद्यालयी ज़िंदगी को नजदीक से देखा जाय पर कभी संभव नहीं हो पाया। इस बार भी लौटने की जल्दी थी अत: मित्र अजय बिसारिया विश्वविद्यालय के ही समीप के एक ऐसे ढाबे पर ले गए जो शाकाहारी भोजन के लिए प्रसिद्ध है। अजय ने बताया कि इस ढाबे का बैंगन का भर्ता सर्वादिक प्रसिद्ध है। ढाबे पर पहुंचने पर उसकी हालत देखकर किंचित निराशा हुई। भयंकर गर्मी, तंदूर का धुआं और उस पर भी प्रतीक्षा करती भारी भीड़। मन वापस लौटने को हुआ कि भोजन के लिए शरीर को इतना कष्ट देना क्या उचित है? उस ढाबे पर इतनी भीड़ थी कि अपनी बारी आने के लिए थोडा इंतजार करना पड़ा. देखने में ढाबा बहुत विशेष नहीं लगा. सड़क के किनारे बने अनेक सैकड़ों ढाबों जैसा ही. ढाबा अलीगढ से अनूपशहर जाने वाली सड़क पर बाएं ओर है. एक बड़ा सा कमरा, उसके आगे टीन का एक शेड. शेड के बीचोंबीच रखी मेज और उसके पीछे रखी कुर्सी पर बैठा या फिर मोटापे के कारण अधलेटा सा, खाने के पैसे लेने वाला ढाबे का मालिक या संभव है कोई उसका प्रतिनिधि या फिर कर्मचारी. अन्य ढाबों की तरह यहाँ भी दूसरे कर्मचारियों के साथ साथ कम से कम चार ‘छोटू’ रहे होंगे जिनमें से एक मेजें साफ़ करने में लगा था, एक मेजों पर स्टील के गिलास रखकर उनमें पानी भर रहा था, एक झूठे बर्तन साफ कर रहा था और चौथा सामने के नल से पानी भरकर ला रहा था. यानी सभी छोटू अपने अपने कार्यों में मुस्तैदी से लगे थे. मुझे क्योंकि जल्दी दिल्ली लौटना था सो बैचेन होकर ये सोच रहा था कि हममें से कोई तो ऐसा निकलेगा जो प्रतीक्षा से परेशान होकर या तो खाना खाने के लिए मना कर देगा या फिर किसी और बेहतर जगह जाने का प्रस्ताव रख देगा. लेकिन किसी के चेहरे पर भी जल्दबाजी या बैचैनी का कोई लक्षण नहीं था. मैं तो कुछ कह ही नहीं सकता था क्योंकि मेरा ही आतिथ्य सत्कार करने के लिए तो ये साथी दोस्त गर्मी की मार झेल रहे थे, वरना अपने अपने  घर जाकर आराम से खाना खाते. अतः मैंने अपनी बैचेनी को छुपा लिया और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा. जल्द ही एक पूरी और एक आधी मेज खाली हो गयीं. एक आधी इसलिए कि चार में से दो ग्राहक उठ चुके थे और दो अपना खाना लगभग समाप्त करने वाले थे. हम कुल छ लोग थे. अलीगढ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज़ुबेरी, प्रो. आशिक अली, डा. विश्व नाथ शुक्ला, डा. शम्भूनाथ तिवारी, अजय बिसारिया और मैं. अन्दर ढाबे में जाकर गर्मी और भी अधिक थी. हम लोग बैठे और अजय ने खाने का आर्डर कर दिया जिसमें बैंगन के भरते के अलावा दाल फ्राई भी थी. तंदूरी रोटी का शौक मुझे हमेशा रहा है. जब भी कार से जाते हुए रास्ते में कोई ठीक ठाक सा ढाबा दिखाई देता है तो मैं दाल फ्राई के साथ तंदूर की गर्म गर्म रोटियां अवश्य खाना पसंद करता हूँ. खैर जब खाना मेज पर सामने आया तो उसकी खुशबू से भूख और बढ़ गयी. पंखे की हवा के बावजूद गर्मी लगभग असह्य हो रही थी लेकिन खाने में तल्लीन हो जाने के कारण उसका अहसास अधिक न हुआ. मैंने प्रो. ज़ुबेरी और अजय बिसारिया को धन्यवाद दिया बैंगन के भरते के लिए प्रसिद्ध इस ढाबे के खाने का स्वाद चखाने के लिए. तभी अजय का एक और प्रस्ताव आया अलीगढ में हाथरस की प्रसिद्ध लस्सी पिलाने ले जाने का. वह भी लाज़वाब. इस आतिथ्य के लिए अपने इन मित्रों की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही होगी. शेष फिर ..