Monday, September 16, 2013

Primary Teacher

प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में जिस अध्यापक ने मुझे पहले दिन अौपचारिक रूप से पढ़ाया उनका नाम था दौलत राम। दौलतराम के नाम में ही दौलत थी वरना दौलत से दूर-दूर तक उनका कोई लेना-देना नहीं था। मेरे पिताजी प्राय: उनके घर भुट्टे और सर्दियों में गन्ने तथा गुड़ आदि भिजवाते। मेरा बाल मन सोचता कि जब हम फीस देते हैं तो पिताजी सामान क्यों भिजवाते है? बाद में मैंने जाना कि उनके पास ज़मीन नहीं थी। वे पड़ौस के ही गांव से आते थे और समय के इतने पाबंद कि मुझे तो गुस्सा तक आ जाता कि रोज क्यों आते हैं, कभी बीमार भी नहीं होते, आदि-आदि । वे पढ़ाने के मामले में बहुत सख़्त थे तथा गलतियों के लिए बहुत डांटते थे। मुझे उनसे बहुत डर लगता था। जब दूसरे बच्चों की किसी बात पर पिटाई होती तो मैं और भी डरने लगता। शायद इस डर का भी परिणाम रहा होगा कि मैंने अपने पढ़ाई के काम में कभी कोई कमी नहीं रहने दी। परिणामत: पिटाई की बात तो दूर कभी डांट भी नहीं पड़ी। यह सचमुच उसी मज़बूत फाउंडेशन का ही परिणाम है। ऐसे अपने ज्ञानदाता गुरू के प्रति नमन।

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