जेएनयू में सतलज हास्टिल के सामने बने शापिंग सेंटर में पुस्तकों की एक दुकान थी, गीता बुक सेंटर। उसके मालिक एक बंगाली थे जिनको सब लोग दादा कहकर पुकारते थे। बंगाली दादा बहुत ही शानदार व्यक्ति थे। मिलनसार। अपने खरीदार की मन: स्थिति को भी वे अच्छी तरह समझते थे।। जिन छात्रों को फेलोशिप मिलती थी उन पर दादा का विशेष प्रेम होता। मैं भी उनमें से एक था। यही कारण था कि जब भी कोई नयी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित होकर आती वे उसे हम लोगों को इस प्रकार बेरुखी से दिखलाते कि हमारी जिज्ञासा उस पुस्तक में और भी अधिक बढ़ जाती। जब पुस्तक विशेष के बारे में अधिक विस्तार से पूछा जाता तो वे समझ जाते कि छात्र की रुचि बढ, रही है। आश्वस्त होने पर वे पुस्तक के बारे में बताकर कहते कि 'एक ही प्रति है दे नहीं सकता।' बहुत आग्रह करने पर दादा कहते कि 'नामवर सिंह जी के लिए लाया हूं, आपके लिए कल ला दूंगा।' फिर कहते कि 'अच्छा ये पुस्तक आप ले लीजिए, नामवर जी के लिए कल दूसरी ला दूंगा।' मनपसंद पुस्तक और वह भी नामवर जी के लिए संभाल कर रखी हुई पुस्तक खरीदकर हम प्रमुदित होकर अपने कमरे में लैटते। लेकिन हमारे जाते ही दादा रैक के पीछे रखी किताबों में से दूसरी प्रति निकाल कर दूसरी जगह रख देते।और किसी अन्य छात्र से नयी किताब की चर्चा करने में व्यस्त हो जाते। यही स्थिति कमोबेश अन्य विभागों के विद्यार्थियों की भी थी। लेकिन दादा की इस सेल्समैनशिप की धीरे-धीरे आदत सी पड़ गयी। आज पुरानी उन यादों के बारे में सोचकर बहुत अच्छा लगता है।
Monday, September 16, 2013
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