विद्वान बहुत धीरे-धीरे बोलते हैं। वे इतना धीमा बोलते हैं कि कभी-कभी यह अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि वे क्या कहना चाहते हैं? विद्वान कम बोलते हैं। वे एक-एक शब्द सोचकर बोलते है। यहां तक कि वे शब्दों को बोलने के बीच में भी सोचते हैं। उन्हें देखकर लग सकता है, बल्कि लगता है कि सोचना कितना ज़रूरी है विद्वान होने के लिए। विद्वान किताबों के साथ बैठना पसंद करते हैं। बल्कि किताबों के बीच बैठे होते है। आजकल तो वे किताबों पर बैठे रहते हैं। ऐसी स्थिति में वे बहुत अच्छे बल्कि और अधिक अच्छे लगते हैं। किताबें उनको बहुत सहारा देती हैं। कभी-कभी विद्वान भी पुस्तकों को सहारा देते हैं विशेषकर तब जब पुस्तकें कुछ कमज़ोर हों। ऐसी स्थिति में विद्वान थोड़ा मुस्कराते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे मुस्कराते नहीं बल्कि इस तरह हसते हैं। शिष्यों का तो यहां तक कहना है कि उनकी वास्तविक हंसी यही है। उस समय हम भी विद्वत जन की हंसी देखकर लाभांन्वित हो सकते हैं।
Sunday, September 22, 2013
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