Sunday, October 20, 2013

स्त्री-विमर्श कल, आज और कल

लोहिया कालेज, चुरू, राजस्थान मे स्त्री-विमर्श कल, आज और कल विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का अनुभव बहुत प्यारा और उत्साहवर्धक रहा। प्यारा इसलिए कि जिस तरह से सेमिनार के आयोजकों ने पूरी व्यवस्था की थी वह निसंदेह अपने आप में सम्पूर्ण थी। संगोष्ठी का आयोजन स्थल और बाहर से आए अतिथि विशेषज्ञों के आवास तथा भोजन आदि की समुचित व्यवस्था थी। आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न होटल में ठहराने के साथ-साथ आयोजकों ने जिस तरह परंपरागत राजस्थानी शैली के भोजन की व्यवस्था की थी वह अवश्य ही सराहनीय था। वैसे तो किसी प्रकार की कोई असुविधा संगोष्ठी के प्रबन्धकों ने होने नहीं दी लेकिन यदि किंचित भी किसी को कुछ लगता तो डॉ उम्मेद सिंह, डॉ मंजु शर्मा और श्री दुलारम सहारन जी के साथ साथ उम्मेद जी के अन्य सभी सहयोगी प्राध्यापक तथा छात्र मदद को हर क्षण तैयार रहते। किसी भी समस्या के लिए का स्वाद देखते ही बनाता था। जहां तक उत्साहवर्धन की बात है तो दिल्ली से इतनी दूर स्त्री-विमर्श जैसे मुद्दे पर अनेक विद्वान वक्ता और प्रतिभागियों के साथ-साथ पत्रकार, कार्यकर्ता और समाजसेवी सगठनों के प्रतिनिधि वहाँ पहुंचे यह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। अनेक विदुषी रचनाकारों और विद्वान आलोचकों से दिल्ली से बाहर चुरू में भेंट हुई। संगोष्ठी के दौरान और उससे बाहर भी प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ. नन्द भारद्वाज, प्रो. रामबक्ष, सुश्री मैत्रेयी पुष्पा, सुश्री मृदुला गर्ग, प्रो रोहिणी अग्रवाल, डॉ. अजय नावरिया, डा. सुमन केसरी, डॉ. अल्पना मिश्रा, डॉ. गंगा सहाय मीणा, श्री दुलाराम सहारन, सुश्री मनीषा पांडे, डॉ एम. दी. गोरा, डॉ उम्मेद गोठवाल, डॉ. मंजु शर्मा, डॉ अंजु ओझा, डॉ गीता सामोर, डॉ रणजीत बुडानिया आदि के साथ बातचीत भूत सार्थक रही। संगोष्ठी का अनुशाशन, सत्तरों की व्यवस्था में समय का परिपालन, मीडिया प्रबंधन, अतिथियों और प्रतिभागियों की देख-भाल, खान-पान और सम्मान की दृष्टि से आयोजक साधुवाद के अधिकारी है। उन्हें इस सफल आयोजन के लिए बहुत-बहुत बधाई,  

Sunday, September 22, 2013

विद्वान

विद्वान बहुत धीरे-धीरे बोलते हैं। वे इतना धीमा बोलते हैं कि कभी-कभी यह अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि वे क्या कहना चाहते हैं? विद्वान कम बोलते हैं। वे एक-एक शब्द सोचकर बोलते है। यहां तक कि वे शब्दों को बोलने के बीच में भी सोचते हैं। उन्हें देखकर लग सकता है, बल्कि लगता है कि सोचना कितना ज़रूरी है विद्वान होने के लिए। विद्वान किताबों के साथ बैठना पसंद करते हैं। बल्कि किताबों के बीच बैठे होते है। आजकल तो वे किताबों पर बैठे रहते हैं। ऐसी स्थिति में वे बहुत अच्छे बल्कि और अधिक अच्छे लगते हैं। किताबें उनको बहुत सहारा देती हैं। कभी-कभी विद्वान भी पुस्तकों को सहारा देते हैं विशेषकर तब जब पुस्तकें कुछ कमज़ोर हों। ऐसी स्थिति में विद्वान थोड़ा मुस्कराते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे मुस्कराते नहीं बल्कि इस तरह हसते हैं। शिष्यों का तो यहां तक कहना है कि उनकी वास्तविक हंसी यही है। उस समय हम भी विद्वत जन की हंसी देखकर लाभांन्वित हो सकते हैं।

Monday, September 16, 2013

Bore

जेएनयू में एक ज़माने में कुछ शब्दों का बहुत प्रचलन था. मसलन चाट, चिपकू, गोंद और फेवीकोल आदि आदि. काशीराम के ढाबे पर चाय पीने बैठे होते तो किसी प्रतिभाशाली चाट को आते देखकर जल्दी उठ जाते ये कहते हुए कि भाग लो चाट आ रहा है. कोई विद्यार्थी कुछ अटपटी बात कहता तो किसी की टिप्पणी होती कि क्या चाट जैसी बाते का रहे हैं. फलां के साथ बहुत रहते हैं आजकल क्या?? और भी कुछ इसी प्रकार की टिप्पणियां. वास्तव में जब आप किसी से बात न करना चाहें और किसी कार्य में बहुत व्यस्त हैं तो मित्र की मौजूदगी भी अप्रिय लगने लगती है. पर ये एक अलग प्रसंग हो सकता है. यहाँ बात परमानेंट चाटों के बारे में है. जेएनयू के ही एक मित्र ने उस समय हद ही कर दी जब मजाक में ही सही उसने परेशान होकर चाटों की भी सैधांतिक व्याख्या कर डाली. उसका कहना था कि चाटवाद के अनुसार चाट तीन प्रकार के होते हैं. एक ऐसे लोग जिनसे बात करके आप चट जाएँ और थोड़े समय के लिए सही काम करने के लायक न रह जाएँ. ऐसे लोगों से थोड़ी सी सावधानी बरत कर आप बच सकते हैं. ये सामान्य कोटि के चाट कहे जा सकते हैं. दूसरी श्रेणी ऐसे लोगों की बनती है जिनके बारे में आपस में बात करके आप चट जाएँ यानी कि बोर हो जाये, ऊब जाये और पूरे दिन काम न कर पायें. ऐसे चाटों से बचने के लिए अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता होती है. तीसरी श्रेणी और भी भयानक लोगों की है. इस सम्बन्ध में दर्शन शास्त्र बहुत सावधान रहने की हिदायत देता है. वास्तव में चाटों का ये ऐसा वर्ग है जिनके स्मरण मात्र से ही आप चाट जाएँ यानी कि इतने बोर हो जाएँ कि बस हो गया आपका उस दिन का काम. यानी कि इस कोटि के लोगों की याद आना ही काफी है आपकी बोरियत में वृद्धि करने के लिए. इस बात के लिए कि आप चट गए. इस सदमे से उबरने में समय लगता है.’ आजकल फेसबुक पर भी कुछ ऐसी ही सावधानी बरतने की दरकार है. नहीं तो तीसरी कोटि के महान कलाकार आपको अपना अहसास कराने में देर नहीं करेंगे.

JNU

जेएनयू में सतलज हास्टिल के सामने बने शापिंग सेंटर में पुस्तकों की एक दुकान थी, गीता बुक सेंटर। उसके मालिक एक बंगाली थे जिनको सब लोग दादा कहकर पुकारते थे। बंगाली दादा बहुत ही शानदार व्यक्ति थे। मिलनसार। अपने खरीदार की मन: स्थिति को भी वे अच्छी तरह समझते थे।। जिन छात्रों को फेलोशिप मिलती थी उन पर दादा का विशेष प्रेम होता। मैं भी उनमें से एक था। यही कारण था कि जब भी कोई नयी महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित होकर आती वे उसे हम लोगों को इस प्रकार बेरुखी से दिखलाते कि हमारी जिज्ञासा उस पुस्तक में और भी अधिक बढ़ जाती। जब पुस्तक विशेष के बारे में अधिक विस्तार से पूछा जाता तो वे समझ जाते कि छात्र की रुचि बढ, रही है। आश्वस्त होने पर वे पुस्तक के बारे में बताकर कहते कि 'एक ही प्रति है दे नहीं सकता।' बहुत आग्रह करने पर दादा कहते कि 'नामवर सिंह जी के लिए लाया हूं, आपके लिए कल ला दूंगा।' फिर कहते कि 'अच्छा ये पुस्तक आप ले लीजिए, नामवर जी के लिए कल दूसरी ला दूंगा।' मनपसंद पुस्तक और वह भी नामवर जी के लिए संभाल कर रखी हुई पुस्तक खरीदकर हम प्रमुदित होकर अपने कमरे में लैटते। लेकिन हमारे जाते ही दादा रैक के पीछे रखी किताबों में से दूसरी प्रति निकाल कर दूसरी जगह रख देते।और किसी अन्य छात्र से नयी किताब की चर्चा करने में व्यस्त हो जाते। यही स्थिति कमोबेश अन्य विभागों के विद्यार्थियों की भी थी। लेकिन दादा की इस सेल्समैनशिप की धीरे-धीरे आदत सी पड़ गयी। आज पुरानी उन यादों के बारे में सोचकर बहुत अच्छा लगता है।

Nazeer

नजीर अकबराबादी ने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ में लिखा है. उन्होंने "कृष्णलीला संबंधी बहुत से पद्य खड़ी बोली हिंदी में लिखे". इन पद्यों का उल्लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' किया है. वे नजीर को एक 'मनमौजी सूफी भक्त' कहते है. आज कृष्ण-जन्माष्टमी है. कई साथियों ने नजीर अकबराबादी की कुछ नज्में उद्धृत की है. नजीर अकबराबादी की एक बेहद खूबसूरत नज़्म याद आई. मूल तो मुझे मिली नहीं, उनकी जो नज़्म शुक्ल जी ने उद्धृत की है, वह यहाँ प्रस्तुत है.
यारो सुनी य दधि के लुटैया का बालपन.
औ मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन.
मोहन स्वरुप नृत्य करैया का बालपन.
बन-बन में ग्वाल गौवें चरैया का बालपन.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन
क्या क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन.
परदे में बालपन के ये उनके मिलाप थे.
जोती सरूप कहिये जिन्हें सो वो आप थे.
- नजीर अकबराबादी

Primary Teacher

प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में जिस अध्यापक ने मुझे पहले दिन अौपचारिक रूप से पढ़ाया उनका नाम था दौलत राम। दौलतराम के नाम में ही दौलत थी वरना दौलत से दूर-दूर तक उनका कोई लेना-देना नहीं था। मेरे पिताजी प्राय: उनके घर भुट्टे और सर्दियों में गन्ने तथा गुड़ आदि भिजवाते। मेरा बाल मन सोचता कि जब हम फीस देते हैं तो पिताजी सामान क्यों भिजवाते है? बाद में मैंने जाना कि उनके पास ज़मीन नहीं थी। वे पड़ौस के ही गांव से आते थे और समय के इतने पाबंद कि मुझे तो गुस्सा तक आ जाता कि रोज क्यों आते हैं, कभी बीमार भी नहीं होते, आदि-आदि । वे पढ़ाने के मामले में बहुत सख़्त थे तथा गलतियों के लिए बहुत डांटते थे। मुझे उनसे बहुत डर लगता था। जब दूसरे बच्चों की किसी बात पर पिटाई होती तो मैं और भी डरने लगता। शायद इस डर का भी परिणाम रहा होगा कि मैंने अपने पढ़ाई के काम में कभी कोई कमी नहीं रहने दी। परिणामत: पिटाई की बात तो दूर कभी डांट भी नहीं पड़ी। यह सचमुच उसी मज़बूत फाउंडेशन का ही परिणाम है। ऐसे अपने ज्ञानदाता गुरू के प्रति नमन।

Rakhi

इस साल रक्षा-बंधन का त्यौहार सुना है रात में मनाया जा रहा है। मैंने अपने एक मित्र को फोन किया यह जानने के लिए कि आखिर इसका रहस्य क्या है? राखी भी क्या कोई रात के अंधेरे में मनाने की चीज़ है? अब तक तो दीपावली के बारे में ही सुना था। यह लगभग ग्यारह बजे के आसपास की बात है। साथी ने मेरी जिज्ञासा पर तो ध्यान नहीं दिया उल्टे चौंकते हुए बोला कि 'यह भी नही मालूम कि राखी कब है? टीवी चैनलों पर विद्वान लोग बार बार बता रहे हैं राखी के महत्व और उसे मनाए जाने की विधियों आदि के बारे में। किस दुनिया में रहते हो तुम? जामिया में पढ़ाते-पढ़ाते सभी परंपराएं और तीज-त्यौहारों का भी ध्यान नहीं रख पाते?' मैं तो चौंकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा था। सोचने लगा कि विश्वविद्यालय अथवा पढ़ाने से राखी का क्या संबंध हो सकता है? फिर खुद को आश्वस्त करते हुए सोचने लगा कि साथी की मज़ाक की आदत है? छोड़ो।
मैंने पूछा कि तुम हो कहां? वह बोला कि 'और कहां होता, ट्रैफिक में फंसा हूं, धौला कुआं के आसपास। पत्नी अपने भाई को राखी बांधने द्वारका जा रही हैं। केवल सुबह सात बजे तक का समय दिया गया है बहनों को राखी बांधने के लिए, बस।' कुछ झुंझलाहट भरी मन:स्थिति में कहने लगा कि 'मेरे तीन साले यानी मेरी पत्नी के प्यारे तीन भाई शहर के तीन कोनो में रहते हैं जैसे दिल्ली की रखवाली की जिम्मेदारी इसी परिवार के कंधों पर है। क्या करूं? सभी के यहां जाना है। लगता है रात भर घूमता ही रहूंगा।' मैंने भी एक बार तो सोचा कि क्यों न मैं भी अपने घर की राखी की कुछ जिम्मेदारी -कम से कम शाहदरा की तरफ की- अपने इस साथी को थमा दूं। पर लगा कि यह कुछ ज़्यादती ही हो जाएगी। अत: साथी का हौसला बढ़ाना ही बेहतर समझा।

Saturday, September 14, 2013

ASC 5th Refresher Course in Hindi


अकादमिक स्टाफ कालिज, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आज हिन्दी का पांचवां रिफ्रेशर कोर्स शुरू हुआ।। इस पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में दिल्ली और दिल्ली के बाहर के 52 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो.नामवर सिंह जी ने पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया। इस अवसर पर अपना व्याख्यान देते हुए उन्होंने रिफ्रेशर कोर्स को पुनश्चर्या पाठ्यक्रम की जगह पुनर्नवा पाठ्यक्रम कहे जाने पर दल दिया। निराला की एक कविता का पाठ और साथ ही उसकी व्याख्या करते हुए आचार्य प्रवर ने ज़ोर देकर कहा कि कविता का सही पाठ करना अध्यापक के लिए एक बहुत बड़ा कौशल है। अकादमिक स्टाफ कालिज के निदेशक प्रो एम मुज़्तबा खान ने स्वागत भाषण देते हुए हिन्दी के विकास पर बल दिया उसकी भूमिका की सराहना की। संयोजक प्रो महेन्द्रपाल शर्मा ने पाठ्यक्रम की थीम 'समकालीन हिन्दी साहित्य की चुनौतियां' की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो हेमलता महीश्वर ने की
— with Hemlata Mahishwar and गंगा सहाय मीणा.

Saturday, June 22, 2013

Aligarh visit

पिछले दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गया था। वैसे तो मैं कई बार अलीगढ़ गया हूं लोकिन रात में कभी नहीं रुक पाया। सुबह कार से गया और शाम को वापस। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मित्रों ने कई बार आग्रह किया कि कम से कम एक दो दिन रुककर वहां की विश्वविद्यालयी ज़िंदगी को नजदीक से देखा जाय पर कभी संभव नहीं हो पाया। इस बार भी लौटने की जल्दी थी अत: मित्र अजय बिसारिया विश्वविद्यालय के ही समीप के एक ऐसे ढाबे पर ले गए जो शाकाहारी भोजन के लिए प्रसिद्ध है। अजय ने बताया कि इस ढाबे का बैंगन का भर्ता सर्वादिक प्रसिद्ध है। ढाबे पर पहुंचने पर उसकी हालत देखकर किंचित निराशा हुई। भयंकर गर्मी, तंदूर का धुआं और उस पर भी प्रतीक्षा करती भारी भीड़। मन वापस लौटने को हुआ कि भोजन के लिए शरीर को इतना कष्ट देना क्या उचित है? उस ढाबे पर इतनी भीड़ थी कि अपनी बारी आने के लिए थोडा इंतजार करना पड़ा. देखने में ढाबा बहुत विशेष नहीं लगा. सड़क के किनारे बने अनेक सैकड़ों ढाबों जैसा ही. ढाबा अलीगढ से अनूपशहर जाने वाली सड़क पर बाएं ओर है. एक बड़ा सा कमरा, उसके आगे टीन का एक शेड. शेड के बीचोंबीच रखी मेज और उसके पीछे रखी कुर्सी पर बैठा या फिर मोटापे के कारण अधलेटा सा, खाने के पैसे लेने वाला ढाबे का मालिक या संभव है कोई उसका प्रतिनिधि या फिर कर्मचारी. अन्य ढाबों की तरह यहाँ भी दूसरे कर्मचारियों के साथ साथ कम से कम चार ‘छोटू’ रहे होंगे जिनमें से एक मेजें साफ़ करने में लगा था, एक मेजों पर स्टील के गिलास रखकर उनमें पानी भर रहा था, एक झूठे बर्तन साफ कर रहा था और चौथा सामने के नल से पानी भरकर ला रहा था. यानी सभी छोटू अपने अपने कार्यों में मुस्तैदी से लगे थे. मुझे क्योंकि जल्दी दिल्ली लौटना था सो बैचेन होकर ये सोच रहा था कि हममें से कोई तो ऐसा निकलेगा जो प्रतीक्षा से परेशान होकर या तो खाना खाने के लिए मना कर देगा या फिर किसी और बेहतर जगह जाने का प्रस्ताव रख देगा. लेकिन किसी के चेहरे पर भी जल्दबाजी या बैचैनी का कोई लक्षण नहीं था. मैं तो कुछ कह ही नहीं सकता था क्योंकि मेरा ही आतिथ्य सत्कार करने के लिए तो ये साथी दोस्त गर्मी की मार झेल रहे थे, वरना अपने अपने  घर जाकर आराम से खाना खाते. अतः मैंने अपनी बैचेनी को छुपा लिया और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा. जल्द ही एक पूरी और एक आधी मेज खाली हो गयीं. एक आधी इसलिए कि चार में से दो ग्राहक उठ चुके थे और दो अपना खाना लगभग समाप्त करने वाले थे. हम कुल छ लोग थे. अलीगढ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज़ुबेरी, प्रो. आशिक अली, डा. विश्व नाथ शुक्ला, डा. शम्भूनाथ तिवारी, अजय बिसारिया और मैं. अन्दर ढाबे में जाकर गर्मी और भी अधिक थी. हम लोग बैठे और अजय ने खाने का आर्डर कर दिया जिसमें बैंगन के भरते के अलावा दाल फ्राई भी थी. तंदूरी रोटी का शौक मुझे हमेशा रहा है. जब भी कार से जाते हुए रास्ते में कोई ठीक ठाक सा ढाबा दिखाई देता है तो मैं दाल फ्राई के साथ तंदूर की गर्म गर्म रोटियां अवश्य खाना पसंद करता हूँ. खैर जब खाना मेज पर सामने आया तो उसकी खुशबू से भूख और बढ़ गयी. पंखे की हवा के बावजूद गर्मी लगभग असह्य हो रही थी लेकिन खाने में तल्लीन हो जाने के कारण उसका अहसास अधिक न हुआ. मैंने प्रो. ज़ुबेरी और अजय बिसारिया को धन्यवाद दिया बैंगन के भरते के लिए प्रसिद्ध इस ढाबे के खाने का स्वाद चखाने के लिए. तभी अजय का एक और प्रस्ताव आया अलीगढ में हाथरस की प्रसिद्ध लस्सी पिलाने ले जाने का. वह भी लाज़वाब. इस आतिथ्य के लिए अपने इन मित्रों की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही होगी. शेष फिर ..